गुरुवाणी

संतो की वाणी ही उनका समाज को दिया गया सबसे अनमोल उपहार माना गया है। महापुरुष यद्यपि देहमर्यादा से बंधे हों परंतु उनकी वाणी अजरामर होकर अनंत काल के लिए भक्तों के जीवनपथ को निरंतर प्रकाशित करती रहती है। सकलमत संप्रदाय का साहित्य अमृत के बादलों जैसा है। घनघोर बादलों को केवल निहारने से एक क्षण के लिए मन को प्रसन्नता अवश्य होती है परंतु उससे कईं गुना अधिक आनंद उन बादलों की वर्षा में भीगने पर प्राप्त होता है। उसी तरह हमारे गुरुजनों की रचनाओं को केवल पढ़ने से या गाने से जो समाधान प्राप्त होता है उससे कईं गुना अधिक तृप्ति उन रचनाओं के अर्थ को आत्मसात् करने में है।

सद्गुरु मनोहर माणिकप्रभु महाराज ने अपनी ज्ञान संपदा से जो सुंदर मोतियाँ दयावश हमापर बरसाई हैं, उन्हीं में से उनकी एक अत्यंत सुंदर रचना है ‘जय जय गुरुभूपा।’ श्रीप्रभु की स्तुति में रचित इस पद का सौंदर्य मन को हर लेने वाला है। इस रचना में महाराजश्री ने सद्गुरु के वचनों द्वारा स्वरूपसाक्षात्कार की विधि का वर्णन अत्यंत समर्पकरीति से किया है। महाराजश्री ने इस रचना के माध्यम से अपने सद्गुरु के प्रति अचंचल भक्ति का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया है। इस रचना की दूसरी पंक्ति अत्यंत विशिष्ट है, जिससे महाराजश्री की उदात्त कल्पनाशक्ति व उत्तुंग काव्यप्रतिभा का परिचय मिलता है। महाराजश्री ने इस एक ही चरण में संपूर्ण वेदांतशास्त्र का सारांश प्रस्तुत करते हुए अपनी सुंदर भावना को कुशलतापूर्वक अभिव्यक्त किया है। सर्वांतर्यामी प्रभु परमात्मा के साक्षात्कार की प्रक्रिया का वर्णन करते हुए महाराजश्री कहते हैं ‘भक्ति स्नेह सद्गुरु वाक्य हे वर्ति। पात्र सोज्वल केले निचित्तवृत्ती। त्यात लोवोनिया सुज्ञान ज्योति। पाजळिली श्रीगुरु माणिकप्रभु मूर्ती॥’
स्वरूप साक्षात्कार के लिए साधन संपत्ति की आवश्यकता होती है इसलिए महाराजश्री ने यहाँ पहले उन साधनों का महत्व बताया है, जिनकी सहायता से साधक की आध्यात्मिक प्रगति होती है। महाराजश्री यहाँ अपने अनुभव को अभिव्यक्त करते हुए कहते हैं – भक्तिरूपी घी में भीगी हुई गुरुवाक्यरूपी बाती को निर्मल अंतःकरणरूपी पात्र में स्थापित कर मैंने उस बाती पर ज्ञान की ज्योत जलाई और उस ज्ञानज्योति के प्रकाश में मैंने श्रीमाणिकप्रभु महाराज के सच्चिदानंदरूप को पाया। यह इस पंक्ति का संक्षेप में अर्थ है। अब हमें इन पंक्तियों के अर्थ पर विस्तार से परिशीलन करना है। अत्यंत अनुपम रूपकों से युक्त ये पंक्तियाँ महाराजश्री के आध्यात्मिक वैभव का द्योतक हैं।

भक्ति को महाराजश्री ने यहाँ पर घी की उपमा दी है क्योंकि आगे उन्होंने गुरुवाक्य को बाती के समान बाताया है। भक्ति को घी कहने के दो कारण हैं। पहला यह, कि घी जो है, वह दूध का सर्वोत्कृष्ट परिष्कार है। घी, दूध की शुद्धतम और अत्यंत सात्विक परिणति है। अब भक्ति पर भी हम यही उपपत्ति लागू करके देखते हैं। परपप्रेम के भाव को ही भक्ति कहा गया है। प्रेम का भाव सभी प्रकार की भावनाओं में सबसे श्रेष्ठ तथा शुद्ध होता है। मनुष्य के अंदर जितनी प्रकार की वृत्तियाँ हैं उन सभी में सबसे उच्च स्तर की वृत्ति प्रेम की है और फिर उसमें भी परमप्रेम सर्वश्रेष्ठ भाव है। विषयासक्ति इसी परमप्रेम का सबसे निकृष्ट स्वरूप माना गया है। महाराजश्री कहते हैं, भक्ति भी घी के ही समान हमारे हृदय से उत्पन्न होने वाला सबसे पवित्र भाव है। भक्ति को घी से जोड़ने का दूसरा कारण ऐसा है, कि जैसे बिना घी के बाती जल नहीं सकती उसी प्रकार भक्ति के अभाव में गुरुवाक्यरूपी बाती भी प्रदीप्त नहीं की जा सकती। महाराजश्री कहते हैं, जबतक हम गुरु के उपदेशों को भक्ति (श्रद्धा/प्रेम) के भाव से नहीं जोड़ते, तबतक वो वाक्य केवल वाक्य ही रह जाते हैं, उस वाक्य में ज्ञान का प्रकाश फैलाने की क्षमता होते हुए भी वे साधक के हृदय को परिवर्तित नहीं करते। जैसे बाती को घी में अच्छी तरह से भिगोने के बाद ही वह बाती प्रज्जवलित होकर सर्वत्र प्रकाश फैलाती है, उसी प्रकार भक्ति और श्रद्धा से विहीन शिष्य को यदि गुरु ने उपदेश कर भी दिया तब भी वे उपदेश निष्फल हो जाते हैं। श्रद्धा के अभाव में लिया हुआ बोध बिना घी की बाती के समान व्यर्थ हो जाता है।

अच्छा, क्या केवल घी और बाती से ही प्रकाश उत्पन्न हो सकता है? दिया जलाने के लिए एक पात्र की, अधिष्ठान की ज़रूरत होती है जिसमें उस घी और बाती को रखा जा सके। महाराजश्री कहते हैं – ‘पात्र सोज्ज्वल केले निज चित्तवृत्ति।’ शुद्ध अंतःकरण को ही महाराजश्री ने यहाँ शुद्ध पात्र की उपमा दी है। भक्ति की भावना होने पर भी यदि हमारा अंतःकरण मलिन हो, तो गुरुवाक्य फलित नहीं हो सकता। श्रद्धापूर्वक प्राप्त किए गए गुरु के उपदेशों को जब निर्मल अंतःकरण का अधिष्ठान प्राप्त होता है, तभी वह वाक्य फलित होता है। उदाहरण के लिए आप रावण को ले लीजिए। रावण अत्यंत विद्वान् था और भगवान् शंकर का परमभक्त भी था परंतु उसका अंतःकरण विकृतियों से, मलिनता से ग्रस्त था। केवल भक्ति की भावना और सद्गुरु का मार्गदर्शन मात्र आध्यात्मिक उन्नति के लिए पर्याप्त नहीं है। इस मार्ग पर अग्रसर होने के लिए शुद्ध अंतःकरण का होना अनिवार्य है। जैसे बंजर भूमि में बीज बोकर उसे पानी से जितना भी सींचिए, वह बीज अंकुरित नहीं होता, ठीक वैसे ही, मलिन अंतःकरण में बोया हुआ गुरुमंत्ररूपी बीज श्रद्धा से सींचे जाने पर भी नष्ट हो जाता है। महाराजश्री कहते हैं, कि मैंने भक्तिरूपी घी में गुरुवाक्यरूपी बाती को भिगोकर निर्मल अंतःकरणरूपी पात्र में रखा है।

आगे महाराजश्री कहते हैं ‘त्यात लावोनिया सुज्ञान ज्योति।’ अब महाराजश्री ने उस बाती को ज्ञान की ज्योति से प्रज्ज्वलित करने की प्रक्रिया बताई है। जब भक्तियुक्त शुद्ध अंतःकरण में गुरुवाक्यरूपी बाती को रखकर, उसपर चिंतन किया जाता है, तब वह बाती ज्ञान की ज्योति से प्रज्ज्वलित हो उठती है। सद्गुरु के मुख से प्राप्त महावाक्य को केवल सुुनने से ज्ञान नहीं होता। महावाक्य श्रवण के पश्‍चात् उस तत्त्व पर साधक जब दीर्घकाल तक सतत मनन और निधिध्यासन करता है, तभी वह महावाक्य साधक के भीतर ज्ञान का प्रकाश फैलाता है। मनन, चिंतन और निधिध्यासन को ही महाराजश्री ने इस संदर्भ में ज्ञानज्योति प्रज्ज्वलित करने की प्रक्रिया बताई है। ऐसा होने पर गुरु का वह वाक्य केवल वाक्य न रहकर हमारे अपने अनुभव में परिवर्तित हो जाता है। गुरु द्वारा दिया गया वह ज्ञान तब हमारा अपना बन जाता है, वही अपरोक्षानुभूति है। इस प्रकार निर्मल मन के अंदर श्रद्धा और भक्ति से सिक्त गुरुवाक्यरूपी बाती को रखकर जब उस उपदेश पर मनन-चिंतन होता है, तब वह बाती ज्ञानज्योति से प्रज्ज्वलित होकर हमारे भीतर के अज्ञानांधकार को मिटा देती है।

इन साधनों की सिद्धि के उपरांत प्राप्त होने वाले फल को बताते हुए महाराजश्री ने कहा है ‘पाजळिली श्रीगुरु माणिकप्रभु मूर्ति।’ सद्गुरु की कृपा से जब अज्ञान तिरोहित हो जाता है, तब हम उस आनंदघन प्रभु परमात्मा से एकरूप हो जाते हैं। महाराजश्री कहते हैं, सत्त्वशुद्ध चित्त में गुरुवाक्य पर मनन के प्रभाव से मेंरे हृदय में आत्मज्योति प्रकाशित हुई तब मैंने श्रीगुरु माणिकप्रभु के दिव्य विग्रह का दर्शन पाया। श्रीप्रभु के दर्शन से महाराजश्री का यहाँ यह तात्पर्य है, कि वे स्वयं प्रभुरूप हो गए।
महाराजश्री ने इस पद के एक ही चरण में संपूर्ण अध्यात्मशास्त्र का सार निचोड़कर रख दिया है। इस रस की एक भी बूंद यदि हमनें अपने हृदय में उतार ली, तो हमारा जीवन सार्थक हो सकता है।