Shri Datta Jayanti Mahotsava – 2021

Shri Siddharaj Manik Prabhu
Samadhi Mandir Inauguration

Sunday 12th December 2021

08:00 AM to 01:00 PM
All devotees will be allowed to have Sparsha Darshan of Shreeji’s Samadhi.

02:00 PM
Teertha Snaan & Yogadanda Poojan

Monday 13th December 2021

09:00 AM
Ganapati Poojan, Punyahvachan, Matruka Poojan, Nandi Shraddha and Praasaad Vastu

Tuesday 13th to Thursday 16th December 2021

Daily Maha-Rudrabhishek to Shreeji’s Samadhi

Friday 17th December 2021

Mahapooja to Shreeji’s Samadhi

JAYANTI MAHOTSAVA PROGRAM

Tuesday 14th December 2021

06:59 AM Suprabhat Seva
07:30 AM Maharudrabhishekam & Japam
10:30 AM Rajopachar Mahapooja
03:00 PM Aaradhana
08:30 PM Maha-Prasad

Wednesday 15th December 2021

10:00 AM Maharudrabhishekam & Japam
02:00 AM Rajopachar Mahapooja
08:30 PM Maha-Prasad

Thursday 16th December 2021

09:00 AM Maharudrabhishekam & Japam
03:00 PM Dakshina Darbar
08:30 PM Maha-Prasad

Friday 17th December 2021

09:00 AM Maharudrabhishekam & Japam
11:00 AM Guru-Poojan
06:00 PM Shreeji’s Pravachan
08:30 PM Maha-Prasad

Saturday 18th December 2021

09:00 AM Maharudrabhishekam & Japam
01:00 PM Darshan & Padyapooja
07:00 PM Rajopchar Mahapooja
09:00 PM Maha-Prasad

Sunday 19th December 2021

11:30 PM Prabhu Darbar begins
12:00 Midnight: Prabhu Janmotsava
12:30 AM Sangeet Sabha

* This program is subject to change in extra ordinary and unavoidable circumstances.

श्री दत्तजयंती महोत्सव निमंत्रण पत्रिका – २०२१

श्री ज्ञानराज माणिकप्रभु

प्लवनाम संवत्सर १९४३, श्रीमाणिक शके २०४

श्रीभक्तकार्यकल्पद्रुम गुरुसार्वभौम श्रीमद्राजाधिराज योगिमहाराज त्रिभुवनानंद
अद्वैत अभेद निरंजन निर्गुण निरालंब परिपूर्ण सदोदित 
सकलमतस्थापित श्रीसद्गुरु माणिकप्रभु महाराज की जय!

संसारातील सर्व प्रकारची कर्मे द्रव्यसाध्य, कालसाध्य व श्रमसाध्य आहेत. ही कर्मे करीत असताना पैसा खर्च होतो, या साठी बराच परिश्रमही करावा लागतो आणि यांच्या परिपूर्ततेत बराच वेळही लागतो. एवढे करूनही ते कर्म सफल होईल किंवा नाहीं, हें निश्चितपणे सांगता येत नाही. तरी जगातील ९९.९% लोक या सांसारिक कर्मांमध्येच व्यस्त असतात आणि अंतत: अपूर्णतेच्या अवस्थेतच मृत्युमुखी पडतात. ही अपूर्णताच पुनर्जन्माला आणि पुनर्मृत्यूला कारणीभूत आहे. यालाच संसारचक्र असे म्हणतात. प्रश्न असा की मनुष्य एवढी कर्मे करतोच कशासाठी? खरे पाहता मनुष्य जेवढी कर्मे करतो त्यांत अधिकांश कर्मे अनावश्यक असतात. प्रत्येकाला एक अपूर्णतेची भावना सतत मनांत असते आणि मनुष्य विचार करतो कि अमुक कर्म केल्याने ही अपूर्णता भरून निघेल, आणि मग तो त्या कर्मामध्ये उद्युक्त होत असतो. थोड्याच वेळांत त्याला कळून चुकते की या कर्माने माझी अपूर्णता भरून निघाली नाहीं, म्हणून तो दुसर्‍या कर्माकडे वळतो आणि कर्मांचे हें चक्र त्याच्या गळ्यांत पडते. कर्मामुळेंच पाप-पुण्यरूपी फळें आहेत आणि पाप-पुण्यरूपी फळांमुळेच देहप्राप्ती आहे आणि देहामुळे दु:ख आहे; ही साधी गोष्ट कुणाच्याही लक्षांत येत नाही.

या संसारचक्ररूपीं दु:खातून मुक्त होण्याचा मार्ग दाखवीत श्रुतिमाउली म्हणते –

ॐ ब्रह्मविदाप्नोति परम्‌ । तदेषाऽभ्युक्ता ।
सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ।
यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् ।
सोऽश्नुते सर्वान् कामान्थ्सह ।
ब्रह्मणा विपश्चितेति ।।

ब्रह्माला जाणणारा ज्ञानी ब्रह्मस्वरूप होऊन जातो. त्याबद्दल ही श्रुति सांगीतली जाते. तो परमात्मा सद्रूप, चिद्रूप आणि अनंत म्हणजे आनंदरूप आहे. तो परमात्मा आकाशाप्रमाणें सर्वत्र व्याप्त असूनही विशेषरूपाने प्राण्यांच्या हृदयरूपी गुहेत वास करतो. त्या परब्रह्म प्रभु परमात्म्याला जाणणारा साधक त्या परमात्म्याशी एकरूप होऊन सर्वप्रकारचे भोग युगपत्‌ म्हणजे एकाचवेळी प्राप्त करून घेतो.

या श्रुतीच्या अनुषंगाने आपल्या जीवनाचा विचार केल्यास असे आढळून येते की आपल्याला सांसारिक भोगांची गरज आहे आणि ब्रह्माला जाणणारा ते सर्व भोग प्राप्त करून घेऊ शकतो. कर्मानी ‘कांही’ भोग प्राप्त होऊ शकतात परंतु ब्रह्माला जाणणारा ‘समस्त’ भोग प्राप्त करून घेतो. दुसरी गोष्ट अशी की कर्मामुळे प्राप्त होणारे भोग एकानंतर एक अशा क्रमाने प्राप्त होतात परंतु ब्रह्मज्ञानी त्या सर्व भोगांचे सुख युगपत्‌ म्हणजे एकदम प्राप्त करून घेतो. या सुखाला प्राप्त करण्याचा जो मार्ग श्रुतीने सांगीतला आहे तो हा की प्रभु सच्चिदानंदस्वरूप असून तो आपल्या हृदयरूपी गुहेंतच वास करतो; हें निश्चितपणें जाणून घ्यावे. यावर कांही लोक म्हणतील की प्रभुला जाणून घेणे अत्यंत कठिण आहे, परंतु असें म्हणणें हें मूर्खपणाचे लक्षण होय.‘करण्या’ पेक्षा ‘जाणणें’ हें केंव्हाही सोपे असते. जाणण्यांत पैसा खर्च होण्याचा प्रश्न नाही, कांही परिश्रम करण्याची गरज नाही आणि वेळही लागत नाही. जगांतील वस्तू आपल्यापासून भिन्न असल्यामुळे ती प्राप्त करण्यांत धन, काल व परिश्रम यांची अपेक्षा असते. किंतु प्रभुपरमात्मा हा स्वत:चे स्वरूप असल्यामुळे त्याला जाणण्यासाठी किती पैसा, किती वेळ आणि किती मेहनत लागणार आहे? आपल्याच घरांत टेबलावर ठेवलेला चश्मा उचलून डोळ्यावर लावण्यांस कमीतकमी अर्ध्या मिनिटाचा वेळ व कमीतकमी ५ कॅलरी शक्तीचा व्यय निश्चितच होईल तथापि डोळ्यांवर आधीच लावून ठेवलेल्या चश्म्यातून पाहण्यांस किती वेळ आणि किती परिश्रम पडतील? या दोन्हीं उदाहरणांत सोपा उपाय कुठला? म्हणून सर्वव्यापक असा सच्चिदानंदरूप प्रभूच माझ्या हृदयांत बसून या शरीरयंत्राला चालवितो, हें जाणून घेणे हा सर्वांत सोपा, सर्वांत सरळ व अगदी नि:शुल्क असा उपाय होय; ज्या मुळें सर्व प्रकारचे सुख अनायास प्राप्त होतात.

त्या हृदयस्थ प्रभूच्या साक्षात्कारासाठी श्रीदत्तजयंती महोत्सवापेक्षा अधिक उपयुक्त असे सुमुहूर्त नाहीं; म्हणून अत्यंत आनंदानें सुचवितो कीं श्रीप्रभूंचा महामांगल्यप्रद असा २०४था श्रीदत्तजयंती महोत्सव संलग्न कार्यक्रमानुसार मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी, मंगळवार १४ दिसंबर २०२१ पासून मार्गशीर्ष कृष्ण प्रतिपदा रविवार १९ दिसंबर २०२१ पर्यंत कोविड १९ च्या सर्व सुरक्षा नियमांचे पालन करीत अत्यंत वैभवपूर्वक सुसंपन्न होत आहे. याच महोत्सवांत आमचे सद्गुरु श्री सिद्धराज माणिकप्रभु महाराजांच्या नवनिर्मित देवालयाची प्रासादवास्तुशांती देखील सुसंपन्न होत आहे. अस्तु या महन्मंगल प्रसंगी आपण सर्वांनी सकुटुंब सपरिवार स्वाश्रितजनसमेत शुभागमन करून श्रीदर्शन तीर्थप्रसाद सेवन व भजनानंद क्रीडेने आनंदवावे. कळावे.

Due to Covid 19 situation this year we are unable to send printed invitation-cards to devotees individually. Devotees can download the PDF version in different languages from here.

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श्री दत्तजयंती महोत्सव निमंत्रण पत्रिका – २०२१

श्री ज्ञानराज माणिकप्रभु

प्लवनाम संवत्सर १९४३, श्रीमाणिक शके २०४

श्रीभक्तकार्यकल्पद्रुम गुरुसार्वभौम श्रीमद्राजाधिराज योगिमहाराज त्रिभुवनानंद
अद्वैत अभेद निरंजन निर्गुण निरालंब परिपूर्ण सदोदित 
सकलमतस्थापित श्रीसद्गुरु माणिकप्रभु महाराज की जय!

जगत्‌ के जितने भी कर्म हैं वे सब द्रव्यसाध्य, कालसाध्य एवं श्रमसाध्य हैं। अर्थात्‌ इन्हें करने में पैसा खर्च होता है और बहुत परिश्रम करना पड़ता है तथा इनके पूर्ण होने में बहुत समय भी लगता है। इतना सब करने पर भी सफलता अवश्य प्राप्त होगी, ऐसा निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता। तथापि हम देखते हैं कि जगत्‌ के ९९.९% लोग इन्हीं सांसारिक कर्मों में जीवनभर व्यस्त रहते हैं और अंतत: अपूर्णता की भावना के साथ ही मृत्यु को प्राप्त होते हैं। यही अपूर्णता पुनर्जन्म का और पुनर्मत्यु का कारण बनती है, इसीको संसारचक्र कहा जाता है। प्रश्न यह है कि मनुष्य इतने सारे कर्म करता ही क्यों है? वास्तविकता तो यह है कि मनुष्य अपने जीवन में जितने कर्म करता है, उनमें अधिकांश कर्म अनावश्यक ही होते हैं। प्रत्येक मनुष्य को सतत एक अपूर्णता का भास होता रहता है और वह सोचता है कि अमुक कर्म करने से यह अपूर्णता पूर्ण होगी और वह उस कर्म को करने लग जाता है। कुछ समय बाद उसे ज्ञात होता है कि इस कर्म से अपूर्णता नहीं मिटी इसलिए वह पुन: एक दूसरा कर्म करने लग जाता है और फिर कर्मों का यह चक्र अव्याहतरूप से चलने लग जाता है। कर्म के कारण ही पाप-पुण्यरूपी फल हैं और उन फलों के कारण ही देह की प्राप्ति है और देह के कारण ही दु:ख है।

इस संसाररूपी दु:ख से सदा के लिए छूटने का मार्ग बतलाते हुए श्रुति कहती है –

ॐ ब्रह्मविदाप्नोति परम्‌ । तदेषाऽभ्युक्ता ।
सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म ।
यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् ।
सोऽश्नुते सर्वान् कामान्थ्सह ।
ब्रह्मणा विपश्चितेति ।।

ब्रह्म को जाननेवाला ज्ञानी ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है, इसी भाव को अभिव्यक्त करनेवाली यह श्रुति कही जाती है। वह परमात्मा सद्रूप, चिद्रूप और अनंत अर्थात्‌ आनंदरूप है। वह परमात्मा आकाश की भॉंति सर्वत्र व्याप्त होते हुए भी विशेषरूप से सभी के हृदयरूपी गुहा में वास करता है। उस परब्रह्म प्रभु को जाननेवाला साधक उस प्रभुपरमात्मा के साथ संयुक्त रहकर सभी प्रकार के भोगों को एकसाथ प्राप्त कर लेता है।

इस श्रुति के परिप्रेक्ष्य में यदि हम अपने जीवन का अवलोकन करें तो पाते हैं कि हमें सांसारिक भोगों की आवश्यकता है और वे समस्त भोग ब्रह्म को जाननेवाला पा लेता है। कर्म से ‘कुछ’ भोग प्राप्त हो सकते हैं किंतु ब्रह्म के ज्ञान से ‘समस्त’ भोग प्राप्त हो जाते हैं। दूसरी बात यह कि कर्म से प्राप्त होनेवाले भोग एक के बाद एक प्राप्त होते हैं किंतु ब्रह्मज्ञानी उन सभी भोगों के सुख को युगपत्‌ अर्थात्‌ एक ही समय में प्राप्त कर लेता है। इस सुख को प्राप्त करने का जो मार्ग श्रुति ने बताया वह यह है कि प्रभु सच्चिदानंदरूप है और वह हमारे ही हृदय में रहता है, इस बात को जान लो। अब लोग कहेंगे कि प्रभु को जान लेना अत्यंत कठिन है, किंतु ऐसा कहना मूर्खतापूर्ण है। ‘करने’ से ‘जानना’ अधिक सरल है। इस जानने में न तो धन का व्यय है, न ही परिश्रम है और न ही समय लगता है। संसार की वस्तुऍं हम से भिन्न हैं उन्हें प्राप्त करने में समय, धन और परिश्रम की आवश्यकता है। किंतु प्रभु हमारा स्वरूप है, उसे जानने में कितनी देर लगेगी, कितना धन खर्च होगा, कितना परिश्रम करना पड़ेगा? अपने ही घर में टेबल पर रखा चश्मा उठाकर पहनने में कम से कम आधे मिनिट का समय और लगभग ५ कॅलरी शक्ति का व्यय तो होगा ही। किंतु आंखों पर पहले से ही लगे चश्मे से देखने में कितना समय और कितना परिश्रम लगेगा? दोनों में कौनसा काम सरल है? इसलिए वह सच्चिदानंदरूप प्रभु मेंरे ही हृदय में बसता है, इस को जानना जगत्‌ का सबसे सरल और सर्वाधिक शीघ्र होनेवाला और सर्वथा नि:शुल्क ऐसा उपाय है, जिसके द्वारा सभी प्रकार के सुख एक साथ प्राप्त हो सकते हैं।

उस हृदयस्थ सच्चिदानंद प्रभु को जानने के लिए श्रीदत्तजयंती महोत्सव से अधिक उपयुक्त और कोई अवसर नहीं हो सकता। इसलिए अतीव आनंद के साथ सूचित करता हूँ कि श्रीप्रभु का महामांगल्यप्रद २०४था श्रीदत्तजयंती महोत्सव संलग्न कार्यक्रमानुसार मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी, मंगलवार १४ दिसंबर २०२१ से मार्गशीर्ष कृष्ण प्रतिपदा रविवार १९ दिसंबर २०२१ तक कोविड १९ के सभी सुरक्षा नियमों का पालन करते हुए अत्यंत वैभवपूर्वक सुसंपन्न हो रहा है। अस्तु आप सभी इस अवसर पर सकुटुंब सपरिवार स्वाश्रितजनसमेत शुभागमन कर श्रीदर्शन तीर्थप्रसाद सेवन एवं भजनानंद क्रीडा से हमें आनंदित करें।

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ಶ್ರೀ ದತ್ತ ಜಯಂತಿ ಮಹೋತ್ಸವ ನಿಮಂತ್ರಣ ಪತ್ರಿಕೆ – 2021

ಶ್ರೀ ಜ್ಞಾನರಾಜ ಮಾಣಿಕಪ್ರಭು

 ಪ್ಲವನಾಮ ಸಂವತ್ಸರ 1943
ಶ್ರೀಮಾಣಿಕ ಶಕೆ 204

ಶ್ರೀ ಭಕ್ತಕಾರ್ಯಕಲ್ಪದ್ರುಮ ಗುರುಸಾರ್ವಭೌಮ ಶ್ರೀಮದ್ರಾಜಾಧಿರಾಜ ಯೋಗಿ-ಮಹಾರಾಜ ತ್ರಿಭುವನಾನಂದ ಅದ್ವೈತ ಅಭೇದ ನಿರಂಜನ ನಿರ್ಗುಣ ನಿರಾಲಂಬ ಪರಿಪೂರ್ಣ ಸದೋದಿತ ಸಕಲಮತಸ್ಥಾಪಿತ ಶ್ರೀ ಸದ್ಗುರು ಮಾಣಿಕಪ್ರಭುಮಹಾರಾಜ ಕಿ ಜಯ್!

ಜಗತ್ತಿನಲ್ಲಿನ ಎಲ್ಲ ಪ್ರಕಾರದ ಕ್ರಿಯೆಗಳೂ ಕೂಡ ಶ್ರಮ, ದ್ರವ್ಯ ಹಾಗೂ ಕಾಲವನ್ನು ಒಳಗೊಂಡಿರುತ್ತವೆ. ಅಂದರೆ, ಕ್ರಿಯೆಗಳನ್ನು ಮಾಡಲು ಶ್ರಮ, ಹಣ, ಉಪಕರಣ ಇತ್ಯಾದಿಗಳ ಆವಶ್ಯಕತೆವಿರುತ್ತದೆ. ಇಷ್ಟೆಲ್ಲ ಮಾಡಿದರೂ ಸಹ, ಆ ಕಾರ್ಯವು ಸಫಲವಾಗುತ್ತದೆ ಅಥವಾ ನಾವು ಅಂದುಕೊಂಡಂತೆ ಆಗುತ್ತದೆ ಎನ್ನುವ ಖಚಿತತೆ ಇರುವುದಿಲ್ಲ. ಆದ್ದರಿಂದ ಜಗತ್ತಿನಲ್ಲಿ 99.9% ಜನರು ಅನಿಶ್ಚಿತತೆಯಿಂದ ಕೂಡಿದ ಈ ಸಾಂಸಾರಿಕ ಕ್ರಿಯೆಗಳಲ್ಲಿ ವ್ಯಸ್ತರಾಗಿದ್ದು ಅಪರಿಪೂರ್ಣತೆಯ ಭಾವದಿದಂದಲೇ ಮೃತ್ಯುವಿನೆಡೆಗೆ ನಡೆಯುತ್ತಾರೆ. ಆ ಅಪರಿಪೂರ್ಣತೆಯ ಭಾವವೇ ಪುನರ್ಜನ್ಮ ಹಾಗೂ ಪುನರ್ಮೃತ್ಯುವಿಗೆ ಕಾರಣವಾಗಿದೆ. ಈದನ್ನೇ ಸಂಸಾರ ಚಕ್ರವೆನ್ನುತ್ತಾರೆ. ಇಲ್ಲಿ ನಾವು ಮನುಷ್ಯನು ಇಷ್ಟೆಲ್ಲ ಕ್ರಿಯೆಗಳನ್ನು ಏತಕ್ಕಾಗಿ ಮಾಡುತ್ತಾನೆ? ಎಂಬ ಪ್ರಶ್ನೆಯನ್ನು ಕೇಳಿಕೊಳ್ಳಬೇಕಾಗುತ್ತದೆ. ಹಾಗೆ ಪರೀಕ್ಷಿಸಿ ನೋಡಿದಾಗ, ಮನುಷ್ಯನ ಬಹುತೇಕ ಕ್ರಿಯೆಗಳು ಅನಾವಶ್ಯಕವಾಗಿವೆ ಎಂಬುದು ಗಮನಕ್ಕೆ ಬರುತ್ತದೆ. ಸದಾಕಾಲ ಅಪೂರ್ಣತೆಯ ಭಾವದಲ್ಲಿರುವ ಮನುಷ್ಯನು ಈ ಕೆಲಸವನ್ನು ಮಾಡಿದರೆ ನನ್ನಲ್ಲಿ ಪೂರ್ಣತೆಯು ಉಂಟಾಗಬಹುದು, ಆ ಕೆಲಸ ಮಾಡಿದರೆ ಆಗಬಹುದು ಎಂಬ ನಿರೀಕ್ಷೆಯಲ್ಲಿ ಕ್ರಿಯೆಗಳನ್ನು ಮಾಡುತ್ತಲೇ ಇರುತ್ತಾನೆ. ತಾನು ಮಾಡುತ್ತಿರುವ ಕ್ರಿಯೆಯಲ್ಲಿ ಪರಿಪೂರ್ಣತೆಯ ಅನುಭವ ಆಗುತ್ತಿಲ್ಲ ಅಂತಾದ ಕೂಡಲೇ, ಅದನ್ನು ಬಿಟ್ಟು ಮತ್ತೊಂದು ಕ್ರಿಯೆಯ ಕಡೆಗೆ ಉದ್ಯುಕ್ತನಾಗುತ್ತಾನೆ ಹಾಗೂ ಈ ಕರ್ಮಚಕ್ರವು ತಿರುಗುತ್ತಲೇ ಇರುತ್ತದೆ. ಈ ರೀತಿ ಪೂರ್ಣತ್ವದ ಹುಡುಕಾಟದಲ್ಲಿ ಮಾಡಲ್ಪಡುವ ಎಲ್ಲ ಕ್ರಿಯೆಗಳಿಗೂ ಪ್ರತಿಕ್ರಿಯೆ ಎಂಬುದು ಇರುತ್ತದೆ. ಆ ಪ್ರತಿಕ್ರಿಯೆಯನ್ನು ಪುಣ್ಯಪಾಪ ಎಂದು ಕರೆಯಲಾಗುತ್ತದೆ. ಜನ್ಮ-ಮರಣರೂಪಿ ಸಂಸಾರ ಚಕ್ರ ಮತ್ತು ದುಃಖದ ಆಧಾರವಾದ ದೇಹಪ್ರಾಪ್ತಿಯ ವಿಚಾರವು ಜೀವಿಗಳಗೆ ತಿಳಿಯುವುದೇ ಇಲ್ಲ. ಈ ಸಂಸಾರ-ಚಕ್ರದಿಂದ ಮುಕ್ತಿ ಹೊಂದುವ ಮಾರ್ಗವನ್ನು ತೋರಿಸುತ್ತ ವೇದಮಾತೆಯು ಈ ರೀತಿ ಹೇಳಿದ್ದಾಳೆ:

ಬ್ರಹ್ಮವಿದಾಪ್ನೋತಿ ಪರಂ। ತದೇಷಾಭ್ಯುಕ್ತಾ। ಸತ್ಯಂ ಜ್ಞಾನಮನಂತಂ ಬ್ರಹ್ಮ।
ಯೋ ವೇದ ನಿಹಿತಂ ಗುಹಾಯಾಂ ಪರಮೇ ವ್ಯೋಮನ್‌।
ಸೋಶ್ನುತೆ ಸರ್ವಾನ್‌ ಕಾಮಾನ್‌ ಸಹ ಬ್ರಹ್ಮಣಾ ವಿಪಶ್ಚಿತೇತಿ॥

ಈ ಶೃತಿಯ ಪ್ರಕಾರ ನಮಗೆ ಲೌಕಿಕ ಸುಖಭೋಗಗಳು ಬೇಕಾಗುತ್ತವೆ ಮತ್ತು ಆ ಎಲ್ಲ ಸುಖಭೋಗಗಳು ಬ್ರಹ್ಮನನ್ನು ಬಲ್ಲವನಿಗೆ ಒಟ್ಟಿಗೇ ಪ್ರಾಪ್ತವಾಗುತ್ತವೆ. `ಕೆಲವು’ ಭೋಗಗಳನ್ನು ಕ್ರಿಯೆಯಿಂದ ಪಡೆಯಬಹುದು, ಆದರೆ `ಎಲ್ಲ’ ಪ್ರಕಾರದ ಭೋಗಗಳನ್ನು ಬ್ರಹ್ಮಜ್ಞಾನದಿಂದ ಸಾಧಿಸಬಹುದು. ಎರಡನೆಯ ವಿಷಯವೆಂದರೆ ಕರ್ಮದಿಂದ ಪಡೆದ ಭೋಗಗಳು ಒಂದರ ನಂತರ ಒಂದು ಒದಗುತ್ತವೆ, ಆದರೆ ಬ್ರಹ್ಮಜ್ಞಾನಿಯು ಆ ಎಲ್ಲ ಭೋಗಗಳ ಆನಂದವನ್ನು ಏಕಕಾಲದಲ್ಲಿ ಅನುಭವಿಸುತ್ತಾನೆ. ಈ ಸಮಸ್ತ ಭೋಗಗಳನ್ನು ಏಕಕಾಲದಲ್ಲಿಯೇ ಅನುಭವಿಸಲು ಶೃತಿಯು ತೋರಿಸುವ ಮಾರ್ಗವೇನೆಂದರೆ ಪರಮ ಆನಂದದ ನಿಧಿಯಾದ ಸಚ್ಚಿದಾನಂದ ಪರಮಾತ್ಮನು ನಮ್ಮ ಹೃದಯದಲ್ಲಿಯೇ ಇದ್ದಾನೆ ಹಾಗೂ ಆ ಸಚ್ಚಿದಾನಂದದ ಪ್ರತಿಫಲನವೇ ಭೋಗಗಳಿಂದ ಉಂಟಾಗುವ ಸಂತೋಷವಾಗಿದೆ. ಆದರೆ ಲೋಕದಲ್ಲಿ ಜನರು ಈ ಸಚ್ಚಿದಾನಂದನಾದ ಪರಮಾತ್ಮನನ್ನು ತಿಳಿಯುವುದು ಕಠಿಣವೆಂದು ಹೇಳುತ್ತಾರೆ. ಆದರೆ ಅದು ವಾಸ್ತವವಲ್ಲ. ಕ್ರಿಯೆಗಳನ್ನು ಮಾಡುವುದಕ್ಕಿಂತ ಜ್ಞಾನವನ್ನು ಪಡೆಯುವುದು ಸುಲಭವಾಗಿದೆ. ಬ್ರಹ್ಮಜ್ಞಾನ ಪಡೆಯಲಿಕ್ಕೆ ಕ್ರಿಯೆಯಂತೆ ಹಣ, ಪರಿಶ್ರಮ ಮತ್ತು ಸಮಯದ ಅಗತ್ಯವು ಇರುವುದಿಲ್ಲ. ಲೋಕದಲ್ಲಿನ ವಸ್ತುಗಳು ಅಥವಾ ಭೋಗಗಳು ನಮ್ಮಿಂದ ಬೇರೆಯಾದ ಅಸ್ತಿತ್ವಗಳಾಗಿವೆ. ಹಾಗಾಗಿ ಅವುಗಳನ್ನು ಪಡೆಯಲು ಸಮಯ, ಶ್ರಮ ಮತ್ತು ಹಣದ ಅಗತ್ಯ ಉಂಟಾಗುತ್ತದೆ. ಆದರೆ ಸಚ್ಚಿದಾನಂದವು ನಮ್ಮದೇ ಸ್ವರೂಪವಾಗಿರುವುದರಿಂದ ನಮ್ಮ ಸ್ವರೂಪವನ್ನು ನಾವು ತಿಳಿಯಲಿಕ್ಕೆ ಶ್ರಮ, ಸಮಯ ಹಾಗೂ ಧನದ ಅಗತ್ಯವಿರುವುದಿಲ್ಲ. ಮೇಜಿನ ಮೇಲೆ ಇಟ್ಟಿರುವ ಕನ್ನಡಕವನ್ನು ಎತ್ತಿಕೊಂಡು ಧರಿಸಲಿಕ್ಕೆ ಕೆಲ ಕ್ಷಣಗಳ ಸಮಯ ಹಾಗೂ ದೇಹದ ಶಕ್ತಿಯ ವ್ಯಯ ಮಾಡಬೇಕಾಗುತ್ತದೆ. ಆದರೆ ಈಗಾಗಲೇ ನಮ್ಮ ಕಣ್ಣಮೇಲೆ ಧರಿಸಿರುವ ಕನ್ನಡಕದ ಮೂಲಕ ನೋಡಲು ಯಾವುದೇ ರೀತಿಯ ವ್ಯಯವಾಗುವುದಿಲ್ಲ. ಹಾಗಾಗಿ ಈಗಾಗಲೇ ನಮ್ಮದೇ ಮೂಲಸ್ವರೂಪವಾಗಿರುವ ಸಚ್ಚಿದಾನಂದ ಪರಮಾತ್ಮನನ್ನು ಅರಿಯುವುದು ಅತ್ಯಂತ ಸರಳವಾದ, ಯಾವುದೇ ಖರ್ಚಿಲ್ಲದ ಹಾಗೂ ಎಲ್ಲ ರೀತಿಯ ಸುಖಗಳಿಗೂ ಮಿಗಿಲಾದ ಆನಂದವನ್ನು ಉಂಟುಮಾಡುವ ಉಪಾಯವಾಗಿದೆ. ಅಂತಹ ಹೃದಯಸ್ಥನಾದ ಸಚ್ಚಿದಾನಂದ ಪರಮಾತ್ಮನನ್ನು ಅರಿಯಲು ಶ್ರೀ ದತ್ತಜಯಂತಿ ಮಹೋತ್ಸವಕ್ಕಿಂತ ಉತ್ತಮವಾದ ಅವಕಾಶವು ಮತ್ತೊಂದಿಲ್ಲ. ಆದ್ದರಿಂದ ಅತ್ಯಂತ ಆನಂದದಿಂದ ತಮ್ಮೆಲ್ಲರಿಗೂ ಸೂಚಿಸುವುದೇನೆಂದರೆ, ಶ್ರೀ ಪ್ರಭುವಿನ 204 ನೇಯ ದತ್ತಜಯಂತಿ ಮಹೋತ್ಸವವು ಈ ಕೆಳಗೆ ನೀಡಿದ ವಿವರಗಳಿಗೆ ಅನುಗುಣವಾಗಿ ಮಾರ್ಗಶೀರ್ಷ ಶುಕ್ಲ ಏಕಾದಶೀ, ಅಂದರೆ, 14 ಡಿಸೆಂಬರ್‌ 2021 ಮಂಗಳವಾರದಿಂದ ಮಾರ್ಗಶೀರ್ಷ ಕೃಷ್ಣ ಪ್ರತಿಪದೆ, ಡಿಸೆಂಬರ್‌ 19, 2021 ರವಿವಾರದ ವರೆಗೆ ವಿಜೃಂಭಣೆಯಿಂದ ಜರುಗಲಿದೆ. ಇದೇ ಮಹೋತ್ಸವದಲ್ಲಿ ನಮ್ಮ ಸದ್ಗುರುಗಳಾದ ಪರಮ ಪೂಜ್ಯ ಶ್ರೀ ಸಿದ್ಧರಾಜ ಮಾಣಿಕಪ್ರಭು ಮಹಾರಾಜರ ನವನಿರ್ಮಿತ ದೇವಾಲಯದ ಪ್ರಾಸಾದ ವಾಸ್ತು ಶಾಂತಿಯ ಕಾರ್ಯಕ್ರಮವೂಕೂಡ ಜರುಗಲಿದೆ. ಈ ಸಂದರ್ಭದಲ್ಲಿ ಕೋರೋನಾಗೆ ಸಂಬಂಧಿಸಿದ ಎಲ್ಲ ನಿಯಮಗಳನ್ನೂ ಅನುಸರಿಸಲಾಗುತ್ತದೆ. ಸದರಿ ಮಹೋತ್ಸವದಲ್ಲಿ ಕುಟುಂಬ ಸಮೇತರಾಗಿ ತಾವೆಲ್ಲರೂ ಪಾಲ್ಗೊಂಡು ತೀರ್ಥಪ್ರಸಾದ, ಆಶೀರ್ವಾದ ಪಡೆದು ಭಜನೆ ಇತ್ಯಾದಿಗಳಿಂದ ಕೂಡಿದ ಉತ್ಸವದಿಂದ ನಮ್ಮನ್ನು ಆನಂದಗೊಳಿಸಬೇಕು.

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శ్రీ దత్తజయంతి మహోత్సవం ఆహ్వాన పత్రిక – 2021

శ్రీ జ్ఞానరాజ్ మాణిక్‌ప్రభు

ప్లవనామ సంవత్సరం 1943
శ్రీమాణిక శకం 204

 శ్రీభక్తకార్యకల్పద్రుమ గురుసార్వభౌమ శ్రీమద్రాజాధిరాజ యోగి మహారాజ త్రిభువనానంద అద్వైత అభేద నిరంజన నిర్గుణ నిరాలంబ పరిపూర్ణ సదోదిత సకలమత స్థాపిత శ్రీసద్గురు మాణిక్‌ప్రభు మహారాజ్ కీ జయ్!

ప్రపంచంలోని అన్ని విధాల కర్మలు ద్రవ్యం, కాలం మరియు శ్రమతోనే సాధ్యమవుతాయి. కర్మలు చేస్తున్నప్పుడు ద్రవ్యం ఖర్చవుతుంది మరియు వాటికోసం చాలా శ్రమించాల్సి వస్తుంది అలాగే అవి పూర్తిచేయడానికి చాలా సమయం కూడా పడుతుంది. ఇంత చేసినా కూడా ఆ కర్మలు సఫలమవుతాయని కానీ కావని కానీ ఖచ్చితంగా చెప్పలేరు. అయినా కూడా ప్రపంచంలోని 99.9% జనం ఈ సంసారిక కర్మలలో మునిగి ఉంటారు మరియు చివరికి అసంపూర్ణ అవస్థలోనే మృత్యుముఖులవుతారు. ఈ అసంపూర్ణతయే పునర్జన్మకు పునర్‌మృత్యువుకు కారణీభూతమైనది. దీనినే సంసారచక్రం అని అంటారు. అసలు ప్రశ్న ఏమిటంటే మనుష్యుడు ఇన్ని కర్మలు ఎందుకు చేస్తాడు? వాస్తవంగా చూస్తే ఒక మనుష్యుడు చేసే కర్మలన్నింటిలో అధికభాగం అనావశ్యకమైనవై ఉంటాయి. ఎల్లప్పుడూ అసంపూర్ణ భావనతో ఉన్న మనుష్యుడు ఈ పని చేస్తే నాకు పరిపూర్ణత లభిస్తుందని నిరీక్షిస్తూ కర్మలు చేస్తూనే ఉంటాడు. తాను చేసే కర్మలో పరిపూర్ణత లభించలేదనిపించగానే దానిని వదిలి మరొక కర్మ చేయడానికి ఉద్యుక్తుడవుతాడు. ఇలాగే ఈ కర్మచక్రం తిరుగుతూనే ఉంటుంది. పూర్ణత్వం కోసం వెతుకుతూ చేసే కర్మలన్నింటికి ఒక ఫలితం ఉంటుంది. ఈ ఫలితాలనే పాప పుణ్యాలు అంటారు. ఈ పాపపుణ్యాల వల్లనే దేహం పొంది జన్మ మరణ చక్రం లోని సుఖ-దుఃఖాలు పొందుతాడు. ఈ సంసార చక్రం నుండి ముక్తి లభించే మార్గం శృతిలో ఇలా చెపుతారు.

బ్రహ్మవిదాప్నోతి పరమ్‌ ౹ తదేషాభ్యుక్తా ౹ సత్యం జ్ఞానమనంతం బ్రహ్మ ౹
యో వేద నిహితం గుహాూం పరమే వ్యోమన్‌ ౹ సోశ్నుతే స్వాన్‌ కామాన్థ్సహ ౹ బ్రహ్మణా విపశ్చితేతి ౹౹

ఈ శృతి ప్రకారం మనం మన జీవతం గురించి ఆలోచిస్తే మనకు తెలిసేది ఏమిటంటే మనకు కావలిసిన అన్నీ సుఖభోగాలను బ్రహ్మను తెలుసుకున్నవాడు అనాయాసంగా పొందగలడు. కర్మతో ఎన్నో సుఖాలు ప్రాప్తమవుతాయి కానీ బ్రహ్మను తెలుసుకున్నవాడు సమస్త భోగాలను పొందగలడు. మరొక విషయం ఏమిటంటే కర్మవల్ల ప్రాప్తించే భోగాలు ఒకదాని తరువాత ఒకటి ఇలా క్రమంగా ప్రాప్తిస్తాయి. కానీ బ్రహ్మజ్ఞాని ఆ సర్వభోగాల సుఖాన్ని ఒకేసారి పొందుతాడు. ఈ సుఖాన్ని పొందే మార్గం శృతిలో పై విధంగా చెప్పడం జరిగింది. అది ఏమిటంటే ప్రభువు సచ్చిదానంద స్వరూపుడై తమ హృదయమనే గుహలోనే నివసిస్తాడని ఖచ్చితంగా తెలుసుకోవాలి. దీనిగురించి కొంతమంది ప్రభువును తెలుసుకోవడం అత్యంత కఠినతరమైనది అంటారు కానీ ఇలా అనడం మూర్ఖత్వ యొక్క లక్షణమవుతుంది. ‘చేయడం’ కంటే ‘తెలుసుకోవడం’ అనేది ఎప్పుడూ కూడా సులభంగా ఉంటుంది. తెలుసుకోవడంలో డబ్బు ఖర్చయ్యే ప్రశ్నే లేదు, ఎలాంటి శ్రమపడవలసిన అవసరం లేదు మరియు సమయం కూడా పట్టదు. జగత్తులో వస్తువు మనకంటే భిన్నమైనదై ఉండడం వల్ల దానిని తెలుసుకోవడానికి ఎంత ద్రవ్యం, ఎంత శ్రమ పడాలి, ఎంత సమయం అవసరమవుతుంది? మన ఇంట్లో టేబల్‌పై పెట్టిన కళ్ళజోడు కళ్ళకు పెట్టుకోవడానికి సుమారు కొన్ని క్షణాలు మరియు 5 కెలోరీల శక్తి ఖర్చవుతుంది. అయితే ముందుగానే పెట్టుకున్న కళ్ళజోడు నుండి చూడడానికి ఎంత సమయం, ఎంత శ్రమ పడాలి? ఈ రెండు ఉదాహరణలలో ఏది సులభమైన ఉపామో మనకు తెలుస్తూంది. అందువల్ల సర్వవ్యాపకుడైన సచ్చిదానందరూప ప్రభువే నా హృదయంలో నివసిస్తూ ఈ శరీరరూప యంత్రాన్ని నడిపిస్తాడు. అని తెలుసుకోవడం అన్నింటికంటే సులభం, సరళం మరియు ఖర్చులేని ఉపాయం. దానివల్ల సర్వవిధాలైన సుఖాలు అనాయాసంగా ప్రాప్తిస్తాయి.

ఆ హృదయస్థ ప్రభువు సాక్షాత్కారం కోసం శ్రీ దత్తజయంతి మహోత్సవం కంటే మించిన ఉపయుక్త సుముహుర్తం లేదు. అందువల్ల తెలియజేయడంలో అత్యంత ఆనందం కలుగజేసే విషయం ఏమిటంటే శ్రీ ప్రభువు యొక్క మహామంగళ ప్రదమైన 204 వ శ్రీ దత్తజయంతి మహోత్సవం ఈ పత్రికలో నిర్దేశించిన కార్యక్రమానుసారం మార్గశీర్ష శుక్ల ఏకాదశి, మంగళవారం 14 డిసెంబర్‌ 2021 నుండి మార్గశీర్ష బహుళ ప్రతిపద ఆదివారం 19 డిసెంబర్‌ 2021 వరకు కోవిడ్‌-19 యొక్క అన్ని సురక్షిత నియామాలను అనుసరిస్తూ అత్యంత వైభవోపేతంగా జరుగనున్నది. ఈ మహోత్సవంలోనే నూతనంగా నిర్మించిన మన సద్గురువు శ్రీ సిద్ధరాజ్‌ మాణిక్‌ఫ్రభు మహారాజుగారి దేవాలయ ప్రాసాదవాస్తుశాంతి కూడా జరుపబడనున్నది. అందువల్ల మీరందరూ ఈ మహామంగళప్రద మహోత్సవం సందర్భంగా సకుటుంబ సపరివార సమేతంగా విచ్చేసి శ్రీదర్శనం చేసుకొని తీర్థప్రసాదాలను స్వీకరించి భజనానంద క్రీడలలో పాల్గొని మమ్మల్ని ఆనందింపజేయగలరు.

Due to Covid 19 situation this year we are unable to send printed invitation-cards to devotees individually. Devotees can download the PDF version in different languages from here.

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